बजरंग बाण की महिमा, संपूर्ण हनुमान चालीसा एवं संकट मोचन बड़ा गणेश सिद्धि यंत्र बजरंग / ( Bajrang baan ki mahima , sampurn Hanuman Chalisa & Sankatmochan bada Ganesh siddhi yantra )
बजरंग बाण की महिमा, संपूर्ण हनुमान चालीसा एवं संकट मोचन बड़ा गणेश सिद्धि यंत्र बजरंग / ( Bajrang baan ki mahima , sampurn Hanuman Chalisa & Sankatmochan bada Ganesh siddhi yantra )
बजरंग बाण की महिमा
बजरंग-बाण में पूरी श्रद्धा रखने और निष्ठापूर्वक उसके बार-बार दोहराने से हमारे मन में हनुमान जी की शक्तियां जमने लगती है। शक्ति के विचार में रमण करने से शरीर में वही शक्तियां बढ़ती हैं। शुभ विचारों को मन में जमाने से मनुष्य की भलाई की शक्तियों में वृद्धि होने लगती है, उसका सतृ-चितृ-आनंदस्वरूप खिलता जाता है, मामूली कष्टों और संकटों से निरोध की शक्तियां विकसित हो जाती हैं तथा साहस और निर्भीकता आ जाती है। इस प्रकार बजरंग-बाण में विश्वास रखने और उसे काम में लेने से कोई भी कायर मनुष्य निर्भय और शक्तिशाली बन सकता है।
बजरंग-बाण के श्रद्धापूर्वक उच्चारण कर लेने से जो मनुष्य शक्ति में पंच महावीर हनुमानजी को स्थायीरूप से अपने मन में धारण कर लेता है, उसे सब संकट अल्पकाल में ही दूर हो जाते हैं।
साधक को चाहिए कि वह अपने सामने हनुमान जी की मूर्ति का उनका कोई भी चित्र रख ले और पूरे आत्मविश्वास तथा निष्ठाभाव से उसका मानसिक ध्यान करें। मन में ऐसी धारणा करें कि हनुमान जी की दिव्य शक्तियां धीरे धीरे-धीरे अंदर प्रवेश कर रही हैं। मेरे अंदर के सारे तथा चारों ओर के वायुमंडल में स्थित संकल्प के परमाणु उत्तेजित हो रहे हैं। ऐसे सशक्त वातावरण में निवास करने से मेरी मन: शक्ति के बढ़ने के सहायता मिलती है। जब यह मूर्ति मन में स्थाई रूप से उतरने लगे, अंदर से शक्ति का स्रोत खुलने लगे, तभी बजरंग बाण की सिद्धि समझनी चाहिए। श्रद्धायुक्त अभ्यास की पूर्णता की सिद्धि में सहायक होता है। पूजन में हनुमान जी की शक्तियों पर एकाग्रता की परम आवश्यकता है।
बजरंग बाण की पाठ विधि
सबसे पहले अपने सामने हनुमान जी की मूर्ति अथवा चित्र रखिये और चंदन, पुष्प, धूप आदि से पूजन कर ध्यान से उन्हें देखिए तथा श्रद्धा के साथ प्रणाम कीजिए। फिर श्रद्धापूर्वक इस प्रकार स्तुति कीजिए-
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानरणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्त वादजातं नमामि।।
अर्थ - आप महावीर हैं। आप में अतुलित बल है। आपके बलको कौन तौल सका है। आप शारीरिक, आध्यात्मिक, नैतिक और हर प्रकार से उत्तम बल की साक्षात मूर्ति हैं। आपकी यह प्रश्न और सशक्त दे पर्वत के समान हैं। अपमें स्वर्णिम तेज देदीप्यमान है।आपकी देह वीर्यबल से ऐसी दीप्तिमान है, मानो सोने का पर्वत चमक रहा हो। आप शक्ति में राक्षसों (और समस्त असुरों शक्तियों)- के वन को जलाने के लिए भयंकर दावानल के समान, है ज्ञानियों में अग्रिमय, सकल शुभ दैवी गुणों से परिपूर्ण, वानर सेना के अधिश्वर, भगवान श्रीराम के प्रिय भक्त और संपूर्ण में पावन जैसे हैं, पवनपुत्र ही हैं। अतः मैं कार्य-सिद्धि के लिए-आपकी शक्ति प्राप्त करने के लिए आपको नमस्कार करता हूं।
इस प्रकार हनुमान जी का श्रद्धापूर्वक ध्यान करके निम्नलिखित बजरंग-बाण का प्रेमपूर्वक उच्चारण करना चाहिए। बार-बार दोहराने से यह कंठस्थ हो जाता है और इसका पाठ करने में समय भी अधिक नहीं लगता।
बजरंग बाण प्रारंभ
।।दोहा।।
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करें सनमान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान।।
अर्थ - जो निश्चल प्रेम और निष्ठा के साथ हनुमान जी का सम्मान करते हुए उनकी विनती करता है, हनुमान जी उसके सारे शुभ कार्य सिद्ध कर देते हैं।
जय हनुमंत संत हितकारी,
सुन लीजै प्रभु अरज हमारी।
जन के काज विलंब न कीजे,
आतुर दौरि महासुख दीजे।
जैसे कूदि सिंधु महि पारा,
सुरसा बदन पैठि विस्तारा।।
अर्थ - हे हनुमान जी! आपकी जय हो! आप भक्तों और संतों के हितैषी हैं, इसलिए हे प्रभो, आप कृपा मेरी विनती सुन लें। आप अपने भक्तों के कार्य में विलंब ना करें, बल्कि वेग से दौड़ कर उन्हें महासुख देकर कृतार्थ करें। जैसे (आपने प्रिय राम के लिए) अपने पृथ्वी को पीछे छोड़कर सिंधु को एक छलांग पर पार किया था और सर्पों की माता सुरसा के मुख में बैठकर अपना विस्तार किया था।
आगे जाय लंकिनी रोका,
मारेहूं लात गई सुर लोका।
जाय विभीषण को सुख दीन्हा,
सीता निरखि परम पद लीना।
अर्थ - आगे जाने पर जब लंकिनी ने आपके मार्ग को रोका, आपने उसकी पीठ पर लात जमाकर उसे सुरलोक भेज दिया और विभीषण के यहां जाकर उसे सुख दिया तथा सीता जी के दर्शन कर परम पद पाने का सौभाग्य प्राप्त किया।
बाग उजारी सिंधु महं बोरा,
अति आतुर यम कातर तोरा ।
अक्षय कुमार को मारी संहारा,
लूट लपेट लंक को जारा ।
अर्थ - लंका की अशोक वाटिका को उजाड़कर आपने उसे समुद्र में डूबा दिया और जब विश्व विनाश के आसन्न संकट से गिरा था उसने उस कातर विश्व को काल के जबड़े को तोड़कर मुक्त किया। इसका एक प्रमाण किया है कि अक्षय कुमार को भी, जिसके नाम से अमरत्व का बोध होता है, मार गिराया और अपनी पूंछ में लगी आग से लपेटकर लंका को जलाकर राख कर दिया।
लाह समान लंक जरि गई,
जय जय धुनि सुरपुर में भई।
अब विलंब केहि कारण स्वामी,
कृपा करहु उर अंतर्यामी।
अर्थ - लाह के समान जब लंका जल गई तब देवलोक में जय-जयकार होने लगी। हे स्वामी! अब आप किसी कारण विलंब कर रहे हैं? यह हृदय में बसने वाले और अंतसृ की भावनाओं के नियामक! मुझ पर कृपा करें।
जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता,
आतुर होय दु:ख करहु निपाता।
जय गिरधर जय-जय सुखसागर,
सुर समूह समरथ भटनागर।
अर्थ - है लक्ष्मण के प्राण के दाता! आपकी जय हो, जय हो! आप यथाशीघ्र आकर मेरे दु:ख-दर्द का नाश करें। हे गिरिधर! हे सुखसागर! आपकी जय हो! जय हो! आप वीरता के सजीव समूह हैं, समर्थ और चतुर योद्धा हैं।
ओम हनु हनु हनु हनुमंता हठीले,
बैरिहिं मारू बज्र की कीले।
गदा वज्र लै बैरिहिं मारो,
महाराज प्रभु दास उबारो।
अर्थ - ओम् हनु हनु हनु का मंत्र उच्चारित करते हुए मैं हठीले हनुमान जी की प्रार्थना करता हूं। हे अपराजेय हनुमान! आप वज्र की कील से मेरे बैरियों का संहार करें, अपनी वज्र सरीखी गदा उठाएं और उन्हें मार गिराएं। हे प्रभो! हे राजाओं के राजा! आप आए और अपने इस दास का उद्धार करे।
ओंकार हुंकार महाप्रभु धावे,
बज्र गदा हनु विलंब ना लावो।
ओं ही्ं ही्ं ही्ं हनुमंत कपीसा,
ओं हुं हुं हुं अरि उर सीसा।
अर्थ - दिव्य और रहस्यमय 'ओम्' के उच्चारण के साथ, हे महावीर, आप शत्रुओं पर धावा बोल दें और वज्र, गदा अन्य शास्त्रास्त्रों को चलाने में विलंब ना करें। हे वानरराज हनुमान! ओम् ही्ं ही्ं ही्ं का उच्चारण करते हुए ओम् हुं हुं हुं की गर्जना के साथ शत्रुओं के सीने पर प्रहार करें।
सत्य होहु हरि शपथ पाय के,
रामदूत धरू मारू धाय के।
जय जय जय हनुमंत अगाधा,
दु:ख पावत जन केहि अपराधा।
अर्थ - हरि की यह प्रतिज्ञा पाकर कि हम सब सत्य ही हैं, हे रामदूत, आप दौड़कर आएं, शत्रुओं को पकड़े और उनका संहार करें! हे अगाध हनुमान! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप कृपया बतलाएं कि किस अपराध के कारण आपके भक्त दु:ख भोगते हैं।
पूजा जप तप नेम अचारा,
नहिं जानत हौं दास तुम्हारा।
वन उपवन मग, गिरि गृह मांही,
तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं।
अर्थ - आपका यह दास पूजा, जब तक नेमाचार आदि से नितांत अनभिज्ञ है। वह आपके बल से निर्भय होकर घर में ही नहीं वनों, उपवनों और पर्वतों के बीच भी रह लेता है।
पायं परों कर जोरि मनावौं,
यहि अवसर अब केहि गौहरावौं।
जय अंजनी कुमार बलवंता,
शंकर सुवन वीर हनुमंता।
अर्थ - मैं आपके पांव पकड़ता हूं और हाथ जोड़कर आपकी कृपा-करुणा की याचना करता हूं। इस अवसर पर और किसकी गुहार करूं ? हे अंजनी और शंकर के बलशाली पुत्र! है वीर हनुमान! आपकी जय हो।
बदन कराल काल कुल घालक,
राम सहाय सदा प्रतिपालक ।
भूत प्रेत पिशाच निशाचर,
अग्नि बैताल काल मारी मर।
अर्थ - आप देखने में भयावान और काल-कुल के विनाशक हैं, किंतु साथ ही राम के अनन्य सहायक तथा दु:खियों के नित्य प्रतिपालक भी। भूत, प्रेत, पिशाच, निशाचर, अग्नि, वेताल, काल, महामारी आदि आपके स्मरणमात्र से भाग जाते हैं (आप इतने शक्तिशाली हैं)।
इन्हें मारूं तोहि शपथ राम की,
राखु नाथ मर्याद नाम की।
जनक सुता हरिदास कहावो,
ताकी शपथ विलंब ना लावो।
अर्थ - आपको श्री राम की शपथ! आप इन्हें मारे और राम नाम की मर्यादा कायम रखें। आप जनकसुता सीता और हरी का भक्त कहलाते हैं। आपको उन्हीं की शपथ! आप अब विलंब ना करें (अविलंब आए और मेरा उद्धार व शत्रुओं का संहार करें)।
जय जय जय धुनि होत अकासा,
सुमिरत होत दूसह दु:ख नासा।
चरण शरण कर जोरि मनावौं,
यही अवसर अब केहि गौहरावौं।
अर्थ - आपके जय-जयकार की ध्वनि से आकाश गूंज उठता है और आप के स्मरणमात्र से असहा् दु:ख भी नष्ट हो जाते हैं। मैं हाथ जोड़कर आपकी चरणों की शरण के लिए प्रार्थना करता हूं - आप इस अवसर पर (संकट की इस घड़ी में) और किसे पुकारूं ?
उठु उठु चलु राम दुहाई,
पांय परौं करि जोरि मनाई।
ओं चं चं चं चं चपल चलंता,
ओं हनु हनु हनु हनु हनुमंता।
अर्थ - आपको राम की शपथ! उठिए, उठिए और चलिए (आकर मेरे शत्रुओं का विनाश कीजिए और मेरे कष्टों का निवारण कीजिए) मैं पुनः साष्टांग करता हूं और हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूं। 'ओम् चं चं चं चं के दिव्य अक्षरों को उच्चारित करते हुए, हे दु्तगति से चलने वाले पवन पुत्र हनुमान, आइए और 'ओम हनु हनु हनु' की गर्जना के साथ मेरे शत्रुओं का हनन कीजिए।
ओं हं हं हांक देत कपि चंचल,
ओं सं सं सहमि पराने खल दल।
अपने जन को तुरत उबारो,
सुमिरत होय आनंद हमारो।
अर्थ - जब चपल-चंचल हनुमान जी 'ओम् हं हं' करते हुए हांक देते हैं तब दुष्टों के दल बल से 'ओम् सं सं' करते हुए भाग जाते हैं। आप आकर अपने भक्तों को यथाशीघ्र उबारिए और नाम लेते ही उसके हृदय को आनंद से भर दीजिए।
यही बजरंङग बाण जेहि मारे,
ताहि कहौ फिर कौन उबारे।
पाठ करें बजरङग बाण की,
हनुमत रक्षा करैं प्राण की।
अर्थ - जिसे बजरंग बाण लग जाए कहिए, उसे कौन बचा सकता है? लेकिन जो बजरंग बाण का समुचित पाठ करता है उसके प्राणों की रक्षा स्वयं हनुमानजी करते हैं।
जय बजरङग बाण जो जापै,
ताते भूत प्रेत सब कांपै।
धूप देय अरु जपैं हमेशा,
ताके मन नहीं रहे कलेशा।
अर्थ - जो भी व्यक्ति इस बजरंग बाण का जाप करता हो, उससे भूत-प्रेतादि सब भयभीत रहते हैं और यदि कोई धूप-दीपादि से इसका नित्य जाप करता है उसके सारे उसके सारे क्लेश मिट जाते हैं।
प्रेम प्रतीतहि कपि भजै, सदा धरै उर ध्यान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान।।
अर्थ - जो भी व्यक्ति भक्ति और प्रीति के साथ कपिराज हनुमान को हृदय में ध्यान कर भेजता है उसके समस्त शुभ कार्य उनकी कृपा से सिद्ध हो जाते हैं।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आरती हनुमान जी की
आरती कीजै हनुमान लला की,
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।
जाके बल से गिरिवर कांपे,
रोग दोष जाके निकट न झांके।
अंजनी पुत्र महा बलदाई,
संतन के प्रभु सदा सहाई।
दे बीड़ा रघुनाथ पठाये,
लंका जारी सिया सुधि लाये।
लंका सो कोट समुद्र सी खाई,
जात पवनसुत बार न लाई।
लंका जारी असुर सब मारे,
सियाराम जी के काज संवारे।
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे,
लाय संजीवन प्राण उबारे।
पैठि पाताल तोरि जय कारे,
अहिरावण की भुजा उखारे।
बाई भुजा असुर संहारे,
दाई भुजा सब संत उबारे।
सुर नर मुनि जन आरति उतारें,
जय जय जय हनुमान उचारें।
कंचन थार कपूर की बाती,
आरती करत अंजना माई।
जो हनुमान जी की आरती गावैं,
बसी बैकुंठ परम पद पायो।
लंका विध्वंस किए रघुराई,
तुलसीदास स्वामी कीरति गाई।
आरती की जय हनुमान लला की,
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
संकट मोचन बड़ा गणेश
सिद्धि मंत्र
संकट मोचन तंत्र यंत्र
ॐ श्री गणेशाय नमः अविघ्नमस्तु
ॐ श्री गणेशाय नमः
ॐ श्री लक्ष्मीयाय नमः
ॐ जय श्री ऋषि सिद्धयाय नमः
ॐ जय श्री लाभ शुभलाभाय नमः
ओम हनुमते नमः! ओम हनुमते नमः! ओम हनुमते नमः!!!
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